मेरी भाषा, मेरा सम्मान I

२० अप्रैल २०१८ की सुबह का हर नीव सदस्य को बेसब्री से इंतजार था I प्रतीक्षा की घड़ी समाप्त हो चली और शनैः शनैः नीव प्रांगण में आगंतुकों की भीड़ इस कदर बढ़ी कि सम्पूर्ण मैदान और प्रांगण का हर कोना पूरी तरह से पट गया I बच्चे, अभिभावक, नाना-नानी, दादा-दादी पूरी तन्मयता से अपने पारम्परिक परिधान में अपनी भाषा और क्षेत्र का गौरव लिए नीव प्रांगण को सुशोभित कर रहे थे  I

भाषा दिवस का शुभारंभ हुआ और उद्घोषिकाएँ पूरे जोशो-खरोश के साथ भाषा-दिवस के महत्व को समझाते हुए बारी-बारी भाषा मंडप के प्रतिनिधि कलाकारों को मुख्य मैदान में आमंत्रित करने लगीं I विविध बोलियों और  भाषाओं के गायन, पारम्परिक नृत्य, और वाद्यों का प्रभाव इतना गहन था कि वहाँ उपस्थित प्रत्येक प्रतिभागी के मन में अपनी भाषा और परम्परा के लिए सम्मान और गर्व के भावों का प्रस्फुटन होने लगा I

मुख्य प्रस्तुति के समापन होते ही विभिन्न भाषा मंडपों ने अपनी अनुपम छटा चहुँ दिशाओं में बिखेर दी I कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली, हिंदी, उर्दू, जर्मन, गुजराती, मारवाड़ी, पंजाबी और मलयालम भाषा के प्रतिनिधि पुनः अपनी परम्परा, भाषा के महत्व, संस्कृति, खान-पान और साहित्य से आगंतुकों के भावों को संदीप्त करने लगे I

छायाचित्र कोष्ठ की छठा भी देखने योग्य थी, विविध भाव भंगिमाओं में लोग तस्वीर खिंचवा कर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा रहे थे I

भाषा दिवस का समापन भारत के विभिन्न प्रदेशों के विविध सुस्वाद व्यंजनों के आस्वादन के पश्चात हुआ Iपिछले वर्ष कुछ अपनी मातृभाषा और संस्कृति के अस्तित्व और सम्मान का प्रश्न लिए और कुछ उसके प्रति अपनापन और सकारात्मक सोच लेकर विदा हुए थे I परन्तु इस बार अमूमन सभी प्रत्यक्षदर्शी अपनी मातृभाषा और संस्कृति के लिए सम्मान, अस्मिता और सकारात्मक सोच लिए नीव प्रांगण से विदा हुए I

साथ में ही भाषा दिवस ने एक सशक्त संदेश दिया है कि भारत देश, भाषा, संस्कृति, पहनावा, रहन-सहन, धर्म, रूप-रंग और वेशभूषा की विभिन्नता लिए हुए भी एक प्रेम सूत्र में बंधा, पूरे विश्व में एकता और शांति का सन्देश प्रवाहित करता है और करता रहेगा I

द्वारा – डा. बिमल कुमार प्रसाद, भाषा प्रमुख, भाषा विभाग

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here